श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 81: शुक्र के शाप से सपरिवार राजा दण्ड और उनके राज्य का नाश  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  7.81.5 
क्षयोऽस्य दुर्मते: प्राप्त: सानुगस्य दुरात्मन:।
य: प्रदीप्तां हुताशस्य शिखां वै स्प्रष्टुमर्हति॥ ५॥
 
 
अनुवाद
इस मूर्ख और दुष्ट बुद्धि वाले राजा का अपने सेवकों सहित विनाश का समय आ गया है, जो जलती हुई अग्नि की धधकती हुई लपटों का आलिंगन करना चाहता है ॥5॥
 
The time has come for the destruction of this foolish and evil-minded king along with his servants, who wants to embrace the blazing flames of the burning fire. ॥ 5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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