श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 81: शुक्र के शाप से सपरिवार राजा दण्ड और उनके राज्य का नाश  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  7.81.3 
तस्य रोष: समभवत् क्षुधार्तस्य विशेषत:।
निर्दहन्निव लोकांस्त्रीन् शिष्यांश्चैतदुवाच ह॥ ३॥
 
 
अनुवाद
यह देखकर भूख से पीड़ित शुक्र ऋषि अत्यन्त क्रोधित हो गए और मानो तीनों लोकों को जला रहे हों, वे अपने शिष्यों से इस प्रकार बोले-॥3॥
 
Seeing this, the sage Sukra, who was suffering from hunger, became very angry and as if he was burning the three worlds, he spoke to his disciples as follows:॥ 3॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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