श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 79: इक्ष्वाकुपुत्र राजा दण्डका राज्य  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  7.79.1 
तदद्भुततमं वाक्यं श्रुत्वागस्त्यस्य राघव:।
गौरवाद् विस्मयाच्चैव भूय: प्रष्टुं प्रचक्रमे॥ १॥
 
 
अनुवाद
अगस्त्यजी के ये अद्भुत वचन सुनकर श्री रघुनाथजी के हृदय में उनके प्रति विशेष अभिमान उत्पन्न हुआ और वे आश्चर्यचकित होकर उनसे पुनः पूछने लगे-॥1॥
 
On hearing these wonderful words of Agastya, a special sense of pride arose in the heart of Sri Raghunatha towards him and, astonished, he began to ask him again -॥ 1॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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