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ramayan 7.78.8: 'उस समय मैं इस दुर्गम वन में आया, जिसमें न पशु हैं, न पक्षी। वन में प्रवेश करके मैं इस सरोवर के सुन्दर तट पर तपस्या करने के लिए बैठ गया।'   |   ramayan सर्ग 7.78: राजा श्वेत का अगस्त्यजी को अपने लिये घृणित आहार की प्राप्ति का कारण बताते हुए ब्रह्माजी के साथ हुए अपनी वार्ता को उपस्थित करना और उन्हें दिव्य आभूषण का दान दे भूख-प्यास के कष्ट से मुक्त होना   ।   ramayan काण्ड 7: उत्तर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 78: राजा श्वेत का अगस्त्यजी को अपने लिये घृणित आहार की प्राप्ति का कारण बताते हुए ब्रह्माजी के साथ हुए अपनी वार्ता को उपस्थित करना और उन्हें दिव्य आभूषण का दान दे भूख-प्यास के कष्ट से मुक्त होना  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  7.78.8 
सोऽहं वनमिदं दुर्गं मृगपक्षिविवर्जितम्।
तपश्चर्तुं प्रविष्टोऽस्मि समीपे सरस: शुभे॥ ८॥
 
 
अनुवाद
'उस समय मैं इस दुर्गम वन में आया, जिसमें न पशु हैं, न पक्षी। वन में प्रवेश करके मैं इस सरोवर के सुन्दर तट पर तपस्या करने के लिए बैठ गया।'
 
‘At that time I came to this inaccessible forest, in which there are neither animals nor birds. After entering the forest, I sat down near the beautiful bank of this lake to perform tapasya. 8.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)