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श्लोक 7.78.29  |
तेनेदं शक्रतुल्येन दिव्यमाभरणं मम।
तस्मिन्निमित्ते काकुत्स्थ दत्तमद्भुतदर्शनम्॥ २९॥ |
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| अनुवाद |
| हे ककुत्स्थ! इन्द्र के समान तेजस्वी राजा श्वेत ने भूख-प्यास मिटाने के लिए मुझे यह अद्भुत दिव्य आभूषण दिया था। |
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| Kakutstha! King Shwet, who was as radiant as Indra, had given me this wonderful looking divine ornament for the aforementioned purpose of satiating the hunger and thirst. |
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डेऽष्टसप्ततितम: सर्ग: ॥ ७ ८॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें अठहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ७ ८॥ |
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