श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 78: राजा श्वेत का अगस्त्यजी को अपने लिये घृणित आहार की प्राप्ति का कारण बताते हुए ब्रह्माजी के साथ हुए अपनी वार्ता को उपस्थित करना और उन्हें दिव्य आभूषण का दान दे भूख-प्यास के कष्ट से मुक्त होना  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  7.78.25 
सर्वान् कामान् प्रयच्छामि भोगांश्च मुनिपुङ्गव।
तारणे भगवन् मह्यं प्रसादं कर्तुमर्हसि॥ २५॥
 
 
अनुवाद
हे मुनि! इस आभूषण से मैं सम्पूर्ण कामनाओं (इच्छित वस्तुओं) और सुखों का दान कर रहा हूँ। हे प्रभु! मेरी मुक्ति के लिए कृपा कीजिए।॥25॥
 
‘O great sage! With this ornament I am giving away all the desires (desired things) and pleasures as well. O Lord! Please bless me for my salvation.'॥ 25॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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