श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 78: राजा श्वेत का अगस्त्यजी को अपने लिये घृणित आहार की प्राप्ति का कारण बताते हुए ब्रह्माजी के साथ हुए अपनी वार्ता को उपस्थित करना और उन्हें दिव्य आभूषण का दान दे भूख-प्यास के कष्ट से मुक्त होना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  7.78.2 
शृणु ब्रह्मन् पुरा वृत्तं ममैतत् सुखदु:खयो:।
अनतिक्रमणीयं च यथा पृच्छसि मां द्विज॥ २॥
 
 
अनुवाद
ब्रह्मन्! तुम जो कुछ पूछ रहे हो, वह मेरे सुख-दुःख का अमिट कारण है जो पूर्वकाल में घटित हो चुका है, वह यहाँ बताया गया है, सुनो॥2॥
 
Brahman! Whatever you are asking, that is the indelible cause of my happiness and sorrow which has happened in the past, it is told here, listen. ॥ 2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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