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श्लोक 7.78.2  |
शृणु ब्रह्मन् पुरा वृत्तं ममैतत् सुखदु:खयो:।
अनतिक्रमणीयं च यथा पृच्छसि मां द्विज॥ २॥ |
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| अनुवाद |
| ब्रह्मन्! तुम जो कुछ पूछ रहे हो, वह मेरे सुख-दुःख का अमिट कारण है जो पूर्वकाल में घटित हो चुका है, वह यहाँ बताया गया है, सुनो॥2॥ |
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| Brahman! Whatever you are asking, that is the indelible cause of my happiness and sorrow which has happened in the past, it is told here, listen. ॥ 2॥ |
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