श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 78: राजा श्वेत का अगस्त्यजी को अपने लिये घृणित आहार की प्राप्ति का कारण बताते हुए ब्रह्माजी के साथ हुए अपनी वार्ता को उपस्थित करना और उन्हें दिव्य आभूषण का दान दे भूख-प्यास के कष्ट से मुक्त होना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  7.78.17 
स त्वं सुपुष्टमाहारै: स्वशरीरमनुत्तमम्।
भक्षयित्वामृतरसं तेन वृत्तिर्भविष्यति॥ १७॥
 
 
अनुवाद
नाना प्रकार के अन्न से पुष्ट होकर तुम्हारा शरीर अमृत से परिपूर्ण हो जाएगा और उसे खाने से तुम्हारी भूख-प्यास तृप्त हो जाएगी ॥17॥
 
Your body, well nourished with various types of food, will be full of nectar and by eating it, your hunger and thirst will be satiated. 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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