श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 78: राजा श्वेत का अगस्त्यजी को अपने लिये घृणित आहार की प्राप्ति का कारण बताते हुए ब्रह्माजी के साथ हुए अपनी वार्ता को उपस्थित करना और उन्हें दिव्य आभूषण का दान दे भूख-प्यास के कष्ट से मुक्त होना  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  7.78.16 
दत्तं न तेऽस्ति सूक्ष्मोऽपि तप एव निषेवसे।
तेन स्वर्गगतो वत्स बाध्यसे क्षुत्पिपासया॥ १६॥
 
 
अनुवाद
'ऐसा प्रतीत नहीं होता कि तुमने कभी देवताओं, पितरों और अतिथियों को किंचित मात्र भी दान दिया हो। तुम तो केवल तपस्या कर रहे थे। बेटा! इसीलिए ब्रह्मलोक में आकर भी तुम भूख-प्यास से पीड़ित हो रहे हो।'
 
‘It does not appear that you have ever donated even a little to the gods, ancestors and guests. You were only doing penance. Son! That is why you are suffering from hunger and thirst even after coming to Brahmaloka.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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