श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 78: राजा श्वेत का अगस्त्यजी को अपने लिये घृणित आहार की प्राप्ति का कारण बताते हुए ब्रह्माजी के साथ हुए अपनी वार्ता को उपस्थित करना और उन्हें दिव्य आभूषण का दान दे भूख-प्यास के कष्ट से मुक्त होना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  7.78.15 
स्वशरीरं त्वया पुष्टं कुर्वता तप उत्तमम्।
अनुप्तं रोहते श्वेत न कदाचिन्महामते॥ १५॥
 
 
अनुवाद
श्वेते! तुमने घोर तप करके केवल अपने शरीर का पालन-पोषण किया है। हे महात्मन! दान का बीज बोए बिना कहीं भी कुछ नहीं उगता - कोई भी खाद्य पदार्थ उपलब्ध नहीं होता॥ 15॥
 
‘Shweta! You have nurtured only your body by performing great penance. O great one! Without sowing the seed of charity, nothing grows anywhere – no edible material is available.॥ 15॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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