श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 78: राजा श्वेत का अगस्त्यजी को अपने लिये घृणित आहार की प्राप्ति का कारण बताते हुए ब्रह्माजी के साथ हुए अपनी वार्ता को उपस्थित करना और उन्हें दिव्य आभूषण का दान दे भूख-प्यास के कष्ट से मुक्त होना  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  7.78.11 
तस्येमे स्वर्गभूतस्य क्षुत्पिपासे द्विजोत्तम।
बाधेते परमोदार ततोऽहं व्यथितेन्द्रिय:॥ ११॥
 
 
अनुवाद
हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! परम उदार मुनि! ब्रह्मलोक में पहुँचने पर भी मुझे भूख-प्यास बहुत सताती है। इससे मेरी सारी इन्द्रियाँ व्याकुल हो जाती हैं।॥11॥
 
O best of Brahmins! Most generous sage! Even after reaching Brahmaloka, hunger and thirst trouble me a lot. All my senses get distressed by it. ॥ 11॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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