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श्लोक 7.76.48-50h  |
अत्यद्भुतमिदं दिव्यं वपुषा युक्तमद्भुतम्॥ ४८॥
कथं वा भवता प्राप्तं कुतो वा केन वाऽऽहृतम्।
कौतूहलतया ब्रह्मन् पृच्छामि त्वां महायश:॥ ४९॥
आश्चर्याणां बहूनां हि निधि: परमको भवान्। |
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| अनुवाद |
| हे महामुनि! यह अत्यन्त अद्भुत और दिव्य आकृति वाला आभूषण आपको कैसे प्राप्त हुआ? अथवा इसे कौन कहाँ से लाया? हे ब्रह्मन्! मैं जिज्ञासावश ही आपसे ये बातें पूछ रहा हूँ; क्योंकि आप अनेक आश्चर्यों के उत्तम कोष हैं।॥48-49 1/2॥ |
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| O great sage! How did you get this extremely wonderful and divinely shaped ornament? Or who brought it from where? O Brahman! I am asking you these things out of curiosity; because you are the best treasure of many wonders.'॥ 48-49 1/2॥ |
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