श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 76: श्रीराम के द्वारा शम्बूक का वध, देवताओं द्वारा उनकी प्रशंसा, अगस्त्याश्रम पर महर्षि अगस्त्य के द्वारा उनका सत्कार और उनके लिये आभूषण-दान  »  श्लोक 48-50h
 
 
श्लोक  7.76.48-50h 
अत्यद्भुतमिदं दिव्यं वपुषा युक्तमद्भुतम्॥ ४८॥
कथं वा भवता प्राप्तं कुतो वा केन वाऽऽहृतम्।
कौतूहलतया ब्रह्मन् पृच्छामि त्वां महायश:॥ ४९॥
आश्चर्याणां बहूनां हि निधि: परमको भवान्।
 
 
अनुवाद
हे महामुनि! यह अत्यन्त अद्भुत और दिव्य आकृति वाला आभूषण आपको कैसे प्राप्त हुआ? अथवा इसे कौन कहाँ से लाया? हे ब्रह्मन्! मैं जिज्ञासावश ही आपसे ये बातें पूछ रहा हूँ; क्योंकि आप अनेक आश्चर्यों के उत्तम कोष हैं।॥48-49 1/2॥
 
O great sage! How did you get this extremely wonderful and divinely shaped ornament? Or who brought it from where? O Brahman! I am asking you these things out of curiosity; because you are the best treasure of many wonders.'॥ 48-49 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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