श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 76: श्रीराम के द्वारा शम्बूक का वध, देवताओं द्वारा उनकी प्रशंसा, अगस्त्याश्रम पर महर्षि अगस्त्य के द्वारा उनका सत्कार और उनके लिये आभूषण-दान  »  श्लोक 46-48h
 
 
श्लोक  7.76.46-48h 
तद् राम: प्रतिजग्राह मुनेस्तस्य महात्मन:॥ ४६॥
दिव्यमाभरणं चित्रं प्रदीप्तमिव भास्करम्।
प्रतिगृह्य ततो रामस्तदाभरणमुत्तमम्॥ ४७॥
आगमं तस्य दीप्तस्य प्रष्टुमेवोपचक्रमे।
 
 
अनुवाद
तब भगवान् श्री राम ने उस ऋषि द्वारा दिया हुआ सूर्य के समान चमकीला, दिव्य, विचित्र और सुन्दर आभूषण स्वीकार कर लिया और उसकी प्राप्ति के विषय में पूछने लगे-॥46-47 1/2॥
 
Then Lord Shri Ram accepted the Sun-like shining, divine, strange and beautiful ornament given by that sage and started asking about its attainment -॥ 46-47 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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