श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 76: श्रीराम के द्वारा शम्बूक का वध, देवताओं द्वारा उनकी प्रशंसा, अगस्त्याश्रम पर महर्षि अगस्त्य के द्वारा उनका सत्कार और उनके लिये आभूषण-दान  »  श्लोक 33-34
 
 
श्लोक  7.76.33-34 
अथोवाच महात्मानमिक्ष्वाकूणां महारथ:॥ ३३॥
रामो मतिमतां श्रेष्ठ: क्षत्रधर्ममनुस्मरन्।
प्रतिग्रहोऽयं भगवन् ब्राह्मणस्याविगर्हित:॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
तब बुद्धिमानों में श्रेष्ठ और इक्ष्वाकुकुल के स्वामी वीर श्री राम ने क्षत्रिय धर्म का विचार करते हुए वहाँ महात्मा अगस्त्य से कहा - 'भगवन्! दान लेने का कार्य केवल ब्राह्मणों के लिए ही निन्दनीय नहीं है।' 33-34॥
 
Then the brave Shri Ram, the best among the wise and the master of Ikshvakukul, while thinking about Kshatriya Dharma, said to Mahatma Agastya there - 'Lord! The act of taking charity is not only condemnable for Brahmins. 33-34॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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