श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 76: श्रीराम के द्वारा शम्बूक का वध, देवताओं द्वारा उनकी प्रशंसा, अगस्त्याश्रम पर महर्षि अगस्त्य के द्वारा उनका सत्कार और उनके लिये आभूषण-दान  »  श्लोक 32-33h
 
 
श्लोक  7.76.32-33h 
भरणे हि भवान् शक्त: फलानां महतामपि।
त्वं हि शक्तस्तारयितुं सेन्द्रानपि दिवौकस:॥ ३२॥
तस्मात् प्रदास्ये विधिवत् तत् प्रतीच्छ नराधिप।
 
 
अनुवाद
इस आभूषण को धारण करने में केवल आप ही समर्थ हैं और उत्तम फल की प्राप्ति कराने की शक्ति केवल आप में ही है। आप इन्द्र आदि देवताओं को भी बचाने में समर्थ हैं, अतः हे मनुष्यों के स्वामी! मैं यह आभूषण आपको ही दूँगा। आप इसे विधिपूर्वक ग्रहण करें।॥32 1/2॥
 
‘Only you are capable of wearing this ornament and you alone have the power to make one attain the greatest fruits. You are capable of saving even Indra and other gods, therefore O Lord of men! I will give this ornament to you only. You should accept it in a proper manner.’॥ 32 1/2॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd