श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 76: श्रीराम के द्वारा शम्बूक का वध, देवताओं द्वारा उनकी प्रशंसा, अगस्त्याश्रम पर महर्षि अगस्त्य के द्वारा उनका सत्कार और उनके लिये आभूषण-दान  »  श्लोक 28-29
 
 
श्लोक  7.76.28-29 
उष्यतां चेह रजनीं सकाशे मम राघव।
प्रभाते पुष्पकेण त्वं गन्तासि पुरमेव हि॥ २८॥
त्वं हि नारायण: श्रीमांस्त्वयि सर्वं प्रतिष्ठितम्।
त्वं प्रभु: सर्वदेवानां पुरुषस्त्वं सनातन:॥ २९॥
 
 
अनुवाद
'रघुनंदन! आज रात इसी आश्रम में मेरे साथ रहो। कल प्रातः पुष्पक विमान से अपने नगर को चले जाओ। आप स्वयं श्रीमन नारायण हैं। सम्पूर्ण जगत् आपमें स्थित है और आप समस्त देवताओं के स्वामी तथा सनातन पुरुष हैं।॥ 28-29॥
 
‘Raghunandan! Stay with me in this ashram tonight. Tomorrow morning go to your city by Pushpak Viman. You are Shriman Narayan himself. The whole world is established in you and you are the master of all the gods and the eternal man.॥ 28-29॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd