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श्लोक 7.75.19  |
इत्येवमुक्त: स नराधिपेन
अवाक्शिरा दाशरथाय तस्मै।
उवाच जातिं नृपपुङ्गवाय
यत्कारणं चैव तप:प्रयत्न:॥ १९॥ |
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| अनुवाद |
| महाराज श्री रामजी के ऐसा पूछने पर उस तपस्वी ने सिर झुकाकर उन महाप्रतापी राजा दशरथपुत्र श्री रामजी को अपनी जाति का परिचय दिया और जिस उद्देश्य से उसने यह तप किया था, वह भी उन्हें बताया॥19॥ |
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| On being asked this by Maharaja Shri Ram, the ascetic hanging with his head down introduced his caste to that great king, son of Dasharatha, Shri Ram, and also told him the purpose for which he had undertaken this penance.॥ 19॥ |
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे पञ्चसप्ततितम: सर्ग: ॥ ७ ५॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें पचहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ७ ५॥ |
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