श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 75: श्रीराम का पुष्पकविमान द्वारा अपने राज्य की सभी दिशाओं में घूमकर दुष्कर्म का पता लगाना; किंतु सर्वत्र सत्कर्म ही देखकर दक्षिण दिशा में एक शूद्र तपस्वी के पास पहुँचना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  7.75.17 
कोऽर्थो मनीषितस्तुभ्यं स्वर्गलाभोऽपरोऽथवा।
वराश्रयो यदर्थं त्वं तपस्यन्यै: सुदुश्चरम्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
तुम क्या चाहते हो? अपनी तपस्या से संतुष्ट देवता से वरदान स्वरूप क्या प्राप्त करना चाहते हो - स्वर्ग या कुछ और? वह कौन सी वस्तु है जिसके लिए तुम इतनी कठोर तपस्या करते हो, जो दूसरों के लिए कठिन है?॥17॥
 
‘What do you desire? What do you wish to receive as a boon from the deity satisfied by your tapasya – heaven or something else? What is that thing for which you perform such severe tapasya, which is difficult for others?॥ 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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