श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 74: नारदजी का श्रीराम से एक तपस्वी शूद्र के अधर्माचरण को ब्राह्मण-बालक की मृत्यु में कारण बताना  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  7.74.22 
एतस्मिन्नन्तरे तेषामधर्मे चानृते च ह।
तत: पूर्वे पुनर्ह्रासमगमन्नृपसत्तम॥ २२॥
 
 
अनुवाद
हे राजनश्रेष्ठ! इस बीच जब त्रेतायुग का अन्त हो जाता है और वैश्य और शूद्र एक पैर वाले पापरूपी अनृत को प्राप्त होने लगते हैं, तब पूर्व वर्ण के ब्राह्मण और क्षत्रिय पुनः पतित होने लगते हैं (क्योंकि उन दोनों को अंतिम दो वर्णों के संसर्ग से उत्पन्न दोष प्राप्त होता है)।॥ 22॥
 
O best of kings! Meanwhile, when the Treta Yuga comes to an end and the Vaishyas and Shudras start getting the one-legged form of evil, the Anrita, then the Brahmins and Kshatriyas of the previous Varna (caste) start getting degraded again (because both of them get the defect arising out of the association with the last two Varnas).॥ 22॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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