श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 74: नारदजी का श्रीराम से एक तपस्वी शूद्र के अधर्माचरण को ब्राह्मण-बालक की मृत्यु में कारण बताना  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  7.74.21 
स्वधर्म: परमस्तेषां वैश्यशूद्रं तदागमत्।
पूजां च सर्ववर्णानां शूद्राश्चक्रुर्विशेषत:॥ २१॥
 
 
अनुवाद
उन चारों वर्णों में से वैश्य और शूद्र ने सेवारूप उत्तम धर्म को अपना धर्म मानकर प्राप्त किया (वैश्य कृषि आदि के द्वारा ब्राह्मण आदि की सेवा करने लगे और) शूद्र समस्त वर्णों (तीनों वर्णों के लोगों) की विशेष रूप से पूजा और सम्मान करने लगे ॥21॥
 
Among those four varnas, Vaishya and Shudra received the excellent religion of service as their own religion (Vaishya started serving Brahmins etc. through agriculture etc. and) Shudra started worshiping and honoring all the varnas (people of all three varnas) especially. 21॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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