श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 74: नारदजी का श्रीराम से एक तपस्वी शूद्र के अधर्माचरण को ब्राह्मण-बालक की मृत्यु में कारण बताना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  7.74.17 
आमिषं यच्च पूर्वेषां राजसं च मलं भृशम्।
अनृतं नाम तद् भूतं पादेन पृथिवीतले॥ १७॥
 
 
अनुवाद
सत्ययुग में जीविका का साधन कृषि तथा अन्य रजोगुणी कर्म 'अनृत' कहलाते थे और मल के समान त्याज्य थे। वही अनृत त्रेतायुग में अधर्म का भाग होकर इस पृथ्वी पर बस गया॥17॥
 
‘In Satya Yuga, agriculture, which was the means of livelihood, and other Rajo Guna based activities were called ‘Anrita’ and were as much to be discarded as filth. That Anrita itself became a part of Adharma and settled on this earth in Treta Yuga.॥ 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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