श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 72: वाल्मीकिजी से विदा ले शत्रुघ्नजी का अयोध्या में जाकर श्रीराम आदि से मिलना और सात दिनोंतक वहाँ रहकर पुनः मधुपुरी को प्रस्थान करना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  7.72.18 
रामस्यैतद् वच: श्रुत्वा धर्मयुक्तं मनोऽनुगम्।
शत्रुघ्नो दीनया वाचा बाढमित्येव चाब्रवीत्॥ १८॥
 
 
अनुवाद
श्री रामचन्द्रजी का यह कथन न केवल धर्मानुकूल था, अपितु हृदय को प्रसन्न करने वाला भी था। यह सुनकर शत्रुघ्न ने श्री राम के वियोग से भयभीत होकर विनीत स्वर में कहा - 'जैसी प्रभु की आज्ञा'।18.
 
This statement of Shri Ramchandraji was not only righteous but also pleasing to the heart. On hearing this, Shatrughna, fearing separation from Shri Ram, said in a meek voice - 'As per the Lord's command'. 18.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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