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श्लोक 7.72.18  |
रामस्यैतद् वच: श्रुत्वा धर्मयुक्तं मनोऽनुगम्।
शत्रुघ्नो दीनया वाचा बाढमित्येव चाब्रवीत्॥ १८॥ |
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| अनुवाद |
| श्री रामचन्द्रजी का यह कथन न केवल धर्मानुकूल था, अपितु हृदय को प्रसन्न करने वाला भी था। यह सुनकर शत्रुघ्न ने श्री राम के वियोग से भयभीत होकर विनीत स्वर में कहा - 'जैसी प्रभु की आज्ञा'।18. |
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| This statement of Shri Ramchandraji was not only righteous but also pleasing to the heart. On hearing this, Shatrughna, fearing separation from Shri Ram, said in a meek voice - 'As per the Lord's command'. 18. |
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