श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 72: वाल्मीकिजी से विदा ले शत्रुघ्नजी का अयोध्या में जाकर श्रीराम आदि से मिलना और सात दिनोंतक वहाँ रहकर पुनः मधुपुरी को प्रस्थान करना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  7.72.14 
नावसीदन्ति राजानो विप्रवासेषु राघव।
प्रजा च परिपाल्या हि क्षात्रधर्मेण राघव॥ १४॥
 
 
अनुवाद
‘रघु कुलभूषण! राजा परदेश में रहते हुए भी दुःखी नहीं होते। रघुवीर! राजा को क्षत्रिय धर्म के अनुसार अपनी प्रजा का पालन करना चाहिए।॥14॥
 
‘Raghu Kulbhushan! Kings do not feel sad even when they live in a foreign land. Raghuveer! The king should take good care of his subjects according to the Kshatriya Dharma.॥ 14॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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