श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 72: वाल्मीकिजी से विदा ले शत्रुघ्नजी का अयोध्या में जाकर श्रीराम आदि से मिलना और सात दिनोंतक वहाँ रहकर पुनः मधुपुरी को प्रस्थान करना  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  7.72.13 
एवं ब्रुवाणं शत्रुघ्नं परिष्वज्येदमब्रवीत्।
मा विषादं कृथा: शूर नैतत् क्षत्रियचेष्टितम्॥ १३॥
 
 
अनुवाद
यह कहकर श्रीराम ने शत्रुघ्न को गले लगा लिया और कहा, 'वीर! तुम दुःखी मत हो। इस प्रकार दुःखी होना क्षत्रिय-सदृश आचरण नहीं है।'
 
Saying these words, Shri Ram embraced Shatrughna and said, 'Valiant one! Do not be sad. To be sad like this is not a Kshatriya-like behavior.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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