श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 72: वाल्मीकिजी से विदा ले शत्रुघ्नजी का अयोध्या में जाकर श्रीराम आदि से मिलना और सात दिनोंतक वहाँ रहकर पुनः मधुपुरी को प्रस्थान करना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  7.72.12 
स मे प्रसादं काकुत्स्थ कुरुष्वामितविक्रम।
मातृहीनो यथा वत्सो न चिरं प्रवसाम्यहम्॥ १२॥
 
 
अनुवाद
‘अमित पराक्रम ककुत्स्थ! जैसे छोटा बालक अपनी माँ से दूर नहीं रह सकता, वैसे ही मैं भी आपसे अधिक समय तक दूर नहीं रह सकूँगा। अतः आप मुझ पर कृपा करें।’॥12॥
 
‘Amit Parakram Kakutstha! Just like a small child cannot stay away from his mother, similarly I will not be able to stay away from you for long. Therefore, please be kind to me.’॥12॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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