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श्लोक 7.72.11  |
द्वादशैतानि वर्षाणि त्वां विना रघुनन्दन।
नोत्सहेयमहं वस्तुं त्वया विरहितो नृप॥ ११॥ |
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| अनुवाद |
| रघुनन्दन! ये बारह वर्ष तो आपके दर्शन के बिना ही किसी प्रकार बीत गए; किन्तु हे मनुष्यों के स्वामी! अब मुझमें आपसे दूर रहने का साहस नहीं है। |
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| Raghunandan! These twelve years have passed somehow without seeing you; but O Lord of men! I do not have the courage to stay away from you for any longer. |
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