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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 70: देवताओं से वरदान पा शत्रुघ्न का मधुरापुरी को बसाकर बारहवें वर्ष में वहाँ से श्रीराम के पास जाने का विचार करना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  7.70.15 
तां समृद्धां समृद्धार्थ: शत्रुघ्नो भरतानुज:।
निरीक्ष्य परमप्रीत: परं हर्षमुपागमत्॥ १५॥
 
 
अनुवाद
उसे पूर्णतः समृद्ध देखकर भरतपुत्र शत्रुघ्न, जिनकी मनोकामनाएं पूर्ण हो चुकी थीं, अत्यंत प्रसन्न हुए और महान आनंद का अनुभव करने लगे।
 
Seeing her fully prosperous, Shatrughna, the son of Bharata, whose wishes had been fulfilled, became extremely happy and began to experience great joy. 15.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)