श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 65: महर्षि वाल्मीकि का शत्रुघ्न को सुदासपुत्र कल्माषपाद की कथा सुनाना  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  7.65.23 
हविष्यं सामिषं स्वादु यथा भवति भोजनम्।
तथा कुरुत शीघ्रं वै परितुष्येद् यथा गुरु:॥ २३॥
 
 
अनुवाद
"आज तुम सब लोग शीघ्रतापूर्वक मांसाहार तैयार करो और उसे इस प्रकार तैयार करो कि वह स्वादिष्ट भोजन बन जाए और मेरे गुरुदेव उससे संतुष्ट हो जाएँ।" ॥23॥
 
"You all should quickly prepare meat based offerings today and prepare it in such a way that it becomes a delicious meal and my Gurudev can be satisfied with it." ॥23॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)