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श्लोक 7.63.31  |
एतत् ते सर्वमाख्यातं शूलस्य च विपर्यय:।
श्रीमत: शितिकण्ठस्य कृत्यं हि दुरतिक्रमम्॥ ३१॥ |
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| अनुवाद |
| इस प्रकार मैंने तुम्हें उस काँटे से छूटने का उपाय तथा अन्य समस्त आवश्यक बातें बताई हैं; क्योंकि भगवान नीलकंठ के विधान को उलटना बहुत कठिन है।॥31॥ |
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| In this way I have told you the way to escape from that thorn and all other essential things; because it is very difficult to reverse the law of Lord Neelkanth.'॥ 31॥ |
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे त्रिषष्टितम: सर्ग: ॥ ६ ३॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें तिरसठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६ ३॥ |
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