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श्लोक 7.63.28  |
स त्वं पुरुषशार्दूल तमायुधविनाकृतम्।
अप्रविष्टं पुरं पूर्वं द्वारि तिष्ठ धृतायुध:॥ २८॥ |
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| अनुवाद |
| मानसिंह! जब वह भाला उसके पास न रहे और वह नगर में न पहुँचे, तब तुम पहले से ही नगर के द्वार पर जाकर अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित होकर उसकी प्रतीक्षा करो॥ 28॥ |
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| Mansingh! When that spear is not with him and he has not reached the city, go to the city gate in advance and wait for him, armed with weapons.॥ 28॥ |
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