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श्लोक 7.62.13-14h  |
दु:खानि च बहूनीह अनुभूतानि पार्थिव।
शयानो दु:खशय्यासु नन्दिग्रामे महायशा:॥ १३॥
फलमूलाशनो भूत्वा जटी चीरधरस्तथा। |
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| अनुवाद |
| पृथ्वीनाथ! महाप्रतापी भरत ने पहले नन्दिग्राम में कष्टमय शय्या पर सोते हुए अनेक कष्ट सहे थे। वे फल-मूल खाकर रहते थे और सिर पर जटाओं वाले चिथड़े पहनते थे।॥13 1/2॥ |
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| ‘Prithvi Nath! The illustrious Bharata had earlier suffered many hardships while sleeping on a painful bed in Nandigram. He lived on fruits and roots and wore rags with matted hair on his head.॥ 13 1/2॥ |
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