श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 61: ऋषियों का मधु को प्राप्त हुए वर तथा लवणासुर के बल और अत्याचार का वर्णन करके उससे प्राप्त होनेवाले भय को दूर करने के लिये श्रीरघुनाथजी से प्रार्थना करना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  7.61.4 
ब्रह्मण्यश्च शरण्यश्च बुद‍्ध्या च परिनिष्ठित:।
सुरैश्च परमोदारै: प्रीतिस्तस्यातुलाभवत्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
वे ब्राह्मणों के बड़े भक्त थे और शरणागतों से प्रेम करते थे। उनकी बुद्धि स्थिर थी। दानशील देवताओं के साथ उनकी ऐसी गहरी मैत्री थी कि उसकी तुलना नहीं की जा सकती थी॥4॥
 
‘He was a great devotee of Brahmins and loved those who sought refuge. His intellect was stable. He had such a deep friendship with the gods who were of a very generous nature that it had no comparison.॥ 4॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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