श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 61: ऋषियों का मधु को प्राप्त हुए वर तथा लवणासुर के बल और अत्याचार का वर्णन करके उससे प्राप्त होनेवाले भय को दूर करने के लिये श्रीरघुनाथजी से प्रार्थना करना  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  7.61.10 
एवं रुद्राद् वरं लब्ध्वा भूय एव महासुर:।
प्रणिपत्य महादेवं वाक्यमेतदुवाच ह॥ १०॥
 
 
अनुवाद
भगवान रुद्र से ऐसा वर पाकर उसने महादैत्य महादेवजी को प्रणाम किया और फिर इस प्रकार कहा-॥10॥
 
“After receiving such a boon from Lord Rudra, he bowed to the great demon Mahadevji and then said thus – ॥ 10॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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