श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 61: ऋषियों का मधु को प्राप्त हुए वर तथा लवणासुर के बल और अत्याचार का वर्णन करके उससे प्राप्त होनेवाले भय को दूर करने के लिये श्रीरघुनाथजी से प्रार्थना करना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  7.61.1 
ब्रुवद्भिरेवमृषिभि: काकुत्स्थो वाक्यमब्रवीत्।
किं कार्यं ब्रूत मुनयो भयं तावदपैतु व:॥ १॥
 
 
अनुवाद
ऐसा कहकर ऋषियों की प्रेरणा से श्री रामचन्द्रजी बोले - 'महर्षिओ! कहिए, मुझे आपका कौन-सा कार्य सम्पन्न करना है! अब तक तो आपका भय दूर हो जाना चाहिए।'॥1॥
 
Having said this, inspired by the sages, Shri Ramchandraji said - 'Maharishis! Tell me, which of your tasks do I have to accomplish! Your fear should go away by now.'॥ 1॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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