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श्लोक 7.6.70  |
तत: शितै: शोणितमांसरूषितै-
र्युगान्तवैश्वानरतुल्यविग्रहै:।
निशाचरा: सम्परिवार्य माधवं
वरायुधैर्निर्बिभिदु: सहस्रश:॥ ७०॥ |
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| अनुवाद |
| दैत्यों के श्रेष्ठ अस्त्र-शस्त्र तीक्ष्ण, रक्त और मांस से सने हुए तथा प्रलयकाल की अग्नि के समान तेजस्वी थे। उनके द्वारा उन हजारों निशाचर प्राणियों ने भगवान लक्ष्मीपति को चारों ओर से घेर लिया और उन पर आक्रमण करने लगे॥70॥ |
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| The best weapons of the demons were sharp, soaked in blood and flesh and as bright as the fire of the Doomsday. Through them, those thousands of nocturnal beings surrounded Lord Lakshmipati from all sides and started attacking him. 70॥ |
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे षष्ठ: सर्ग: ॥ ६ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें छठा सर्ग पूरा हुआ ॥ ६ ॥ |
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