श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 6: देवताओं का भगवान् शङ्कर की सलाह से राक्षसों के वध के लिये भगवान् विष्णुकी शरण में जाना और उनसे आश्वासन पाकर लौटना, राक्षसों का देवताओं पर आक्रमण और भगवान् विष्णु का उनकी सहायता के लिये आना  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  7.6.43 
विष्णोर्द्वेषस्य नास्त्येव कारणं राक्षसेश्वर।
देवानामेव दोषेण विष्णो: प्रचलितं मन:॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
हे दैत्यराज! विष्णु के मन में हमारे प्रति द्वेष उत्पन्न करने का कोई कारण नहीं है। (क्योंकि हमने उनका कोई अपराध नहीं किया है) केवल देवताओं की गपशप के कारण ही उनका मन हमसे विमुख हो गया है।॥43॥
 
O demon lord! There is no reason in the mind of Vishnu to have any animosity towards us. (Because we have not done any crime to him) It is only because of the gossip of the gods that his mind has turned away from us. ॥ 43॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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