श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 6: देवताओं का भगवान् शङ्कर की सलाह से राक्षसों के वध के लिये भगवान् विष्णुकी शरण में जाना और उनसे आश्वासन पाकर लौटना, राक्षसों का देवताओं पर आक्रमण और भगवान् विष्णु का उनकी सहायता के लिये आना  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  7.6.13 
शङ्खचक्रधरं देवं प्रणम्य बहुमान्य च।
ऊचु: सम्भ्रान्तवद् वाक्यं सुकेशतनयान् प्रति॥ १३॥
 
 
अनुवाद
शंख और चक्र धारण करने वाले उन नारायणदेव को नमस्कार करके देवताओं ने उनके प्रति बड़ी श्रद्धा प्रकट की और सुकेशा के पुत्रों के विषय में बड़ी चिन्ता के साथ इस प्रकार कहा -॥13॥
 
Salutations to that Narayana Deva holding conch and discus, the gods expressed great respect towards him and spoke with great anxiety about the sons of Sukesha as follows -॥ 13॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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