श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 6: देवताओं का भगवान् शङ्कर की सलाह से राक्षसों के वध के लिये भगवान् विष्णुकी शरण में जाना और उनसे आश्वासन पाकर लौटना, राक्षसों का देवताओं पर आक्रमण और भगवान् विष्णु का उनकी सहायता के लिये आना  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  7.6.10 
अहं तान् न हनिष्यामि ममावध्या हि तेऽसुरा:।
किं तु मन्त्रं प्रदास्यामि यो वै तान् निहनिष्यति॥ १०॥
 
 
अनुवाद
हे देवताओं! मैंने सुकेश के प्राण बचाए हैं। वे दैत्य सुकेश के पुत्र हैं; अतः वे मेरे द्वारा मारे जाने योग्य नहीं हैं। अतः मैं उन्हें नहीं मारूँगा; परन्तु मैं तुम्हें ऐसे व्यक्ति के पास जाने की सलाह दूँगा जो उन दैत्यों का अवश्य ही वध कर देगा॥ 10॥
 
‘O gods! I have saved the life of Sukesha. Those demons are the sons of Sukesha; therefore they are not worthy of being killed by me. Therefore, I will not kill them; but I will advise you to go to a person who will surely kill those demons.॥ 10॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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