श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 54: राजा नृग का एक सुन्दर गड्ढा बनवाकर अपने पुत्र को राज्य दे स्वयं उसमें प्रवेश करके शाप भोगना  »  श्लोक 9-10h
 
 
श्लोक  7.54.9-10h 
यत्राहं संक्षयिष्यामि शापं ब्राह्मणनि:सृतम्।
वर्षघ्नमेकं श्वभ्रं तु हिमघ्नमपरं तथा॥ ९॥
ग्रीष्मघ्नं तु सुखस्पर्शमेकं कुर्वन्तु शिल्पिन:।
 
 
अनुवाद
'मैं वहाँ रहकर ब्राह्मण के मुख से निकले हुए शाप को भोगूँगा। एक गड्ढा ऐसा हो जो वर्षा के कष्टों को दूर कर सके। दूसरा गड्ढा शीत से रक्षा करे और कारीगर तीसरा गड्ढा ऐसा बनाएँ जो गर्मी को दूर कर सके और जिसका स्पर्श सुखदायक हो।॥9 1/2॥
 
‘I will live there and bear the curse that came out of the mouth of the Brahmin. One pit should be such that it can alleviate the sufferings of rain. The second should protect from cold and the craftsmen should make a third pit that can alleviate the heat and whose touch is pleasant.॥9 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)