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ramayan 7.52.5: महल के द्वार पर रथ से उतरकर, पुरुषोत्तम लक्ष्मण सिर झुकाए और दुःखी मन से बिना किसी रोक-टोक के भीतर चले गए।   |   ramayan सर्ग 7.52: अयोध्या के राजभवन में पहुँचकर लक्ष्मण का दुःखी श्रीराम से मिलना और उन्हें सान्त्वना देना   ।   ramayan काण्ड 7: उत्तर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 52: अयोध्या के राजभवन में पहुँचकर लक्ष्मण का दुःखी श्रीराम से मिलना और उन्हें सान्त्वना देना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  7.52.5 
राज्ञस्तु भवनद्वारि सोऽवतीर्य नरोत्तम:।
अवाङ्मुखो दीनमना: प्रविवेशानिवारित:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
महल के द्वार पर रथ से उतरकर, पुरुषोत्तम लक्ष्मण सिर झुकाए और दुःखी मन से बिना किसी रोक-टोक के भीतर चले गए।
 
Alighting from the chariot at the palace gate, that best of men Lakshmana went inside without any hindrance with his head down and a sad mind.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)