श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 52: अयोध्या के राजभवन में पहुँचकर लक्ष्मण का दुःखी श्रीराम से मिलना और उन्हें सान्त्वना देना  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  7.52.13 
शक्तस्त्वमात्मनाऽऽत्मानं विनेतुं मनसा मन:।
लोकान् सर्वांश्च काकुत्स्थ किं पुन: शोकमात्मन:॥ १३॥
 
 
अनुवाद
हे ककुत्स्थकुलभूषण! आप आत्मा को आत्मा, मन को मन तथा सम्पूर्ण लोकों को वश में करने में समर्थ हैं; फिर आपके लिए अपने शोक को वश में कर लेना कौन सी बड़ी बात है?॥13॥
 
Kakutsthakulbhushan! You are capable of controlling soul to soul, mind to mind and even entire worlds; then what is a big deal for you to control your grief?॥ 13॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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