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श्लोक 7.52.10  |
मा शुच: पुरुषव्याघ्र कालस्य गतिरीदृशी।
त्वद्विधा नहि शोचन्ति बुद्धिमन्तो मनस्विन:॥ १०॥ |
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| अनुवाद |
| 'पुरुषसिंह! तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए। काल का यही नियम है। तुम्हारे समान बुद्धिमान् पुरुष शोक नहीं करते।॥10॥ |
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| ‘Purushasingh! You should not grieve. Such is the course of time. Wise and intelligent people like you do not grieve.॥ 10॥ |
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