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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
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काण्ड 7: उत्तर काण्ड
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सर्ग 51: मार्ग में सुमन्त्र का दुर्वासा के मुख से सुनी हुर्इ भृगुऋषि के शाप की कथा कहकर तथा भविष्य में होनेवाली कुछ बातें बताकर दुःखी लक्ष्मण को शान्त करना
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श्लोक 7-8h
श्लोक
7.51.7-8h
तत: कथायां कस्यांचित् प्राञ्जलि: प्रग्रहो नृप:॥ ७॥
उवाच तं महात्मानमत्रे: पुत्रं तपोधनम्।
अनुवाद
तत्पश्चात् किसी कथा के प्रसंग में राजा ने हाथ जोड़कर अत्रिपुत्र तपस्वी महात्मा दुर्वासाजी से नम्रतापूर्वक पूछा -॥7 1/2॥
‘Thereafter, in the context of some story, the King with folded hands humbly asked Mahatma Durvasaji, the ascetic son of Atri -॥ 7 1/2॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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