श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 51: मार्ग में सुमन्त्र का दुर्वासा के मुख से सुनी हुर्इ भृगुऋषि के शाप की कथा कहकर तथा भविष्य में होनेवाली कुछ बातें बताकर दुःखी लक्ष्मण को शान्त करना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  7.51.4 
स दृष्ट्वा सूर्यसंकाशं ज्वलन्तमिव तेजसा।
उपविष्टं वसिष्ठस्य सव्यपार्श्वे महामुनिम्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
वहाँ उन्होंने वसिष्ठजी के बाईं ओर एक महान ऋषि को बैठे देखा, जो अपनी प्रभा से सूर्य के समान चमक रहे थे।
 
There he saw a great sage sitting on Vasishtha's left side, who was shining like the Sun with his radiance.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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