श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 51: मार्ग में सुमन्त्र का दुर्वासा के मुख से सुनी हुर्इ भृगुऋषि के शाप की कथा कहकर तथा भविष्य में होनेवाली कुछ बातें बताकर दुःखी लक्ष्मण को शान्त करना  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  7.51.26 
एतद् वचो मया तत्र मुनिना व्याहृतं पुरा।
श्रुतं हृदि च निक्षिप्तं नान्यथा तद् भविष्यति॥ २६॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार दुर्वासा मुनि ने पूर्वकाल में जो कुछ कहा था, वह सब मैंने सुनकर अपने हृदय में रख लिया है (किसी को बताया नहीं)। वे वचन मिथ्या नहीं होंगे॥ 26॥
 
‘Thus, I heard all the things spoken by Durvasa Muni in the past and kept them in my heart (I did not reveal them to anyone). Those words will not be false.॥ 26॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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