श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 51: मार्ग में सुमन्त्र का दुर्वासा के मुख से सुनी हुर्इ भृगुऋषि के शाप की कथा कहकर तथा भविष्य में होनेवाली कुछ बातें बताकर दुःखी लक्ष्मण को शान्त करना  »  श्लोक 16-17h
 
 
श्लोक  7.51.16-17h 
शापाभिहतचेतास्तु स्वात्मना भावितोऽभवत्॥ १६॥
अर्चयामास तं देवं भृगु: शापेन पीडित:।
 
 
अनुवाद
परन्तु इस प्रकार शाप देने के पश्चात् उनके मन में बड़ा पश्चाताप हुआ। उनकी अंतरात्मा ने उन्हें शाप स्वीकार कराने के लिए भगवान की आराधना करने की प्रेरणा दी। इस प्रकार शाप के असफल होने के भय से पीड़ित भृगु ने तपस्या द्वारा भगवान विष्णु की आराधना की। 16 1/2॥
 
But after cursing like this, there was great remorse in his mind. His conscience inspired him to worship God to make him accept the curse. In this way, Bhriguna, suffering from the fear of failure of the curse, worshiped Lord Vishnu through penance. 16 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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