श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 51: मार्ग में सुमन्त्र का दुर्वासा के मुख से सुनी हुर्इ भृगुऋषि के शाप की कथा कहकर तथा भविष्य में होनेवाली कुछ बातें बताकर दुःखी लक्ष्मण को शान्त करना  »  श्लोक 15-16h
 
 
श्लोक  7.51.15-16h 
यस्मादवध्यां मे पत्नीमवधी: क्रोधमूिर्च्छत:।
तस्मात् त्वं मानुषे लोके जनिष्यसि जनार्दन॥ १५॥
तत्र पत्नीवियोगं त्वं प्राप्स्यसे बहुवार्षिकम्।
 
 
अनुवाद
‘जनार्दन! मेरी पत्नी वध करने योग्य नहीं थी। परंतु आपने क्रोधवश उसे मार डाला, इसलिए आपको मनुष्य लोक में जन्म लेना पड़ेगा और वहाँ अनेक वर्षों तक अपनी पत्नी के वियोग का दुःख भोगना पड़ेगा।’॥15 1/2॥
 
‘Janardan! My wife was not worthy of being killed. But you killed her in a fit of rage, therefore you will have to take birth in the human world and there you will have to suffer the pain of separation from your wife for many years.’॥ 15 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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