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श्लोक 7.5.47  |
जगद्भ्रमन्तोऽनिलवद् दुरासदा
रणेषु मृत्युप्रतिमानतेजस:।
वरप्रदानादपि गर्विता भृशं
क्रतुक्रियाणां प्रशमंकरा: सदा॥ ४७॥ |
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| अनुवाद |
| वह वायु के समान संसार में विचरण करता था। युद्ध में उसे पराजित करना अत्यन्त कठिन था। वह मृत्यु के समान तेजस्वी था। वरदान प्राप्त करने के बाद भी उसका अभिमान बहुत बढ़ गया था, अतः वह यज्ञ आदि अनुष्ठानों का घोर विनाश करता था। |
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| He used to roam around the world like the wind. It was very difficult to defeat him in battle. He was as radiant as death. Even after getting the boon, his pride had increased a lot; hence he used to cause great destruction to the rituals like Yagya etc. |
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे पञ्चम: सर्ग: ॥ ५ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें पाँचवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५ ॥ |
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