| श्रीमद् वाल्मीकि रामायण » काण्ड 7: उत्तर काण्ड » सर्ग 5: सुकेश के पुत्र माल्यवान्, सुमाली और माली की संतानों का वर्णन » श्लोक 14-15 |
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| | | | श्लोक 7.5.14-15  | तपसाऽऽराधितो देव यदि नो दिशसे वरम्॥ १४॥
अजेया: शत्रुहन्तारस्तथैव चिरजीविन:।
प्रभविष्ण्वो भवामेति परस्परमनुव्रता:॥ १५॥ | | | | | | अनुवाद | | ‘भगवन्! यदि आप हमारी तपस्या से प्रसन्न होकर पूजित हैं और हमें वर देना चाहते हैं, तो हम पर ऐसी कृपा कीजिए कि हमें कोई पराजित न कर सके। हम अपने शत्रुओं का वध करने में समर्थ हों, दीर्घायु हों, पराक्रमी हों। साथ ही हममें परस्पर प्रेम भी बना रहे।’॥14-15॥ | | | | ‘God! If you are pleased and worshiped by our penance and want to grant us a boon, then do us such a favour that no one can defeat us. We should be capable of killing our enemies, should be long-lived and powerful. Along with that, there should be mutual love between us.’॥ 14-15॥ | | ✨ ai-generated | | |
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