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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
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सर्ग 48: सीता का दुःखपूर्ण वचन, श्रीराम के लिये उनका संदेश, लक्ष्मण का जाना और सीता का रोना
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श्लोक 6
श्लोक
7.48.6
सा कथं ह्याश्रमे सौम्य वत्स्यामि विजनीकृता।
आख्यास्यामि च कस्याहं दु:खं दु:खपरायणा॥ ६॥
अनुवाद
'परन्तु सौम्य! अब मैं आश्रम में अपने प्रियजनों से रहित होकर अकेला कैसे रहूँगा? और जब मैं दुःखी होऊँगा, तब किससे अपना दुःख कहूँगा?॥6॥
‘But Saumya! How will I now live alone in the ashram, devoid of my loved ones? And to whom will I share my sorrows when I am in pain?॥ 6॥
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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